हस्त शिल्पकारों की स्वास्थ्यगत समस्याओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन

 

हेमलता बोरकर वासनिक1, बंसो सो नुरुटी2, कमलेश गोगिया3

1 प्रोफेसर, समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग , पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत

और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएससीआर), नई दिल्ली परियोजना की निदेशक।

2 सहायक प्रोफेसर, इतिहास विभाग, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत

3 समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग , पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत

और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएससीआर), नई दिल्ली परियोजना मे रिसर्च असिस्टेंट ।

*Corresponding Author E-mail: hemlataborkar@gmail.com, bansonuruti@gmail.com

 

ABSTRACT:

छत्तीसगढ़ राज्य सहित भारत के विभिन्न राज्यों में शिल्पकला का क्षेत्र शिल्पकारों को आजीविका प्रदान करने के साथ ही अनेक स्वास्थ्यगत जोखिमों से भी जुड़ा हुआ है। सामान्य रूप से यह देखने में आया है कि पारंपरिक शिल्प कार्य प्रायः लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठकर या झुककर किया जाता है, जिसमें दोहरावयुक्त गतियाँ, भारी औज़ारों का प्रयोग, सूक्ष्म दृष्टि-कार्य तथा अपर्याप्त कार्यस्थल सुविधाएँ शामिल होती हैं। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य शिल्पकारों में पाई जाने वाली प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान करना तथा उनके कारणों और प्रभावों का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है तथा विभिन्न शोध-पत्रोंए रिपोर्टों और सर्वेक्षणों के निष्कर्षों का समेकित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। शोध अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पीठ दर्द, गर्दन दर्द (मस्कुलोस्केलेटल विकार), दृष्टि संबंधी समस्याएँ, श्वसन रोग, त्वचा रोग, पैरों मे झुंझुनी और मानसिक तनाव शिल्पकारों में सामान्य रूप से पाए जाते हैं। अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक तनाव के चलते ये इस कार्य से धीरे-धीरे अपने आप को अलग करना चाह रहे हैं, आजीविका के चलते इन्हे यह कार्य मजबूरीवश करना पड़ रहा है।

 

KEYWORDS: शिल्पकार, शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य एवं प्रभाव

 

 


INTRODUCTION:

भारत में हस्त शिल्पकार (कारीगर) समुदाय का बहुत बड़ा भाग निवासरत है, जो परंपरागत हस्तशिल्प, कुम्हारी, लोहारए बढ़ई, बुनकर, मूर्तिकार आदि कार्यों से जुड़ा हुआ है। ये लोग देश की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से इनकी स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर होती है, जिसके कारण इन्हें अनेक स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

 

भारत की जनगणना 2011 के अनुसारए कृषि कार्य के बाद हस्तशिल्प उद्योग दूसरा सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाला उद्योग हैए जिसमें देश के 7.6 मिलियन से अधिक हस्त्शिल्पकार कार्यरत हैं। भारत में हस्त शिल्पकला रोजगार का एक प्रमुख स्रोत है, (मुखोपाध्याय पी., 2010)। हस्तशिल्प में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के श्रम की आवश्यकता होती है (क्रॉफर्ड,   2009 । एक सच्चा शिल्पकार अपने व्यावहारिक अनुभव और चिंतन के बीच निरंतर संवाद के माध्यम से उत्कृष्ट कृति बनाता है। शिल्पकारी में निरंतर प्रयास शामिल होता है जो किसी व्यक्ति को सामग्री के साथ अपने कौशल को निखारने के साथ-साथ बेहतर बनने में सक्षम बनाता है (मिलर, 2011)। भारत विश्व बाजार में हस्तशिल्प के महत्वपूर्ण आपूर्ति कर्ताओं में से एक है। भारतीय हस्तशिल्प उद्योग एक अत्यधिक श्रम-प्रधान कुटीर उद्योग है और विकेंद्रीकृत है, जो देश भर में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में फैला हुआ है। कई कारीगर अंशकालिक आधार पर शिल्प कार्य में लगे हुए हैं। यह उद्योग छह मिलियन से अधिक कारीगरों को रोजगार प्रदान करता है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और समाज के कमजोर वर्गों से संबंधित लोग शामिल हैं। हस्तशिल्प क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में शिल्पकारों के एक विशाल वर्ग को रोजगार प्रदान करता है और देश के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा उत्पन्न करता हैए साथ ही इसकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है लेकिन इनके कार्य की प्रकृतिए सामाजिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियों के कारण इन्हें कई प्रकार की स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं को केवल चिकित्सकीय नहीं बल्कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से समझना भी आवश्यक है।

 

प्राचीन काल से भारत अपने हस्तशिल्प हुनर एवं समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है । प्राचीन काल में हस्त शिल्पकार अपने शिल्प कौशल के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध थे। मंदिरों पर की गई नक्काशी इस तथ्य की गवाही देती है। भारतीय हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्यात प्राचीन काल से होता आ रहा है (राव, 1979)। छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर क्षेत्र, जो देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक प्रमुख हिस्सा है, अपने पारंपरिक कौशल का उपयोग विभिन्न शिल्पों जैसे मिट्टी, लकड़ी, धातु, बाँस, लौहे, पत्थर, कौड़ी एवं पत्ते के शिल्प, निर्माण में करता है। शिल्पकार, शिल्प कौशल को पारिवारिक परंपरा के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करते आ रहा है । समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो शिल्पकारों की स्वास्थ्य समस्याएँ केवल चिकित्सकीय नहीं बल्कि सामाजिकए आर्थिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों से भी जुड़ी होती हैं। इस अध्ययन में शिल्पकारों की प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं और उनके सामाजिक कारणों का विश्लेषण किया गया है।

 

शिल्पकला से आशय:

अपने नाम के अनुरूप, “हस्तशिल्प” (हाथों से निर्मित शिल्प) उद्योग विभिन्न वस्तुओं के निर्माण के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी के बजाय पारंपरिक हस्तकला विधियों का उपयोग करता है। यह एक असंगठित, विकेन्द्रीकृत, श्रम प्रधान कुटीर उद्योग है (भारतीय अर्थव्यवस्था सांख्यिकी पुस्तिकाए 2006)।

 

सेनेट (2008) ने कहा कि है कि हस्तशिल्प केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि तकनीकी कौशल, काम के प्रति समर्पण और निर्णय लेने की क्षमता का एक अनूठा मिश्रण है।

 

शोध साहित्य की समीक्षा:

स्वास्थ्य समस्याओं को समझने के लिए विभिन्न शोधों की समीक्षा की गई है –

इमान डायनाट और मोहम्मद अली करीमी (2016) ने अपने क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन में इरान के 632 विभिन्न हस्तशिल्प श्रमिकों (कार्पेट, वस्त्र, चमड़ा) से प्रयोग किए गए डेटा की मदद से मस्कुलोस्केलेटल लक्षणों (MSDs) के प्रचलन और जोखिम कारकों की जांच की गई। इससे पता चला कि गर्दन (57.9%), कमर (51.6%) और कंधों (40.5%) में दर्द की उच्च प्रचलन दर है और यह मुख्यतः लंबे समय तक बैठकर काम, खराब कार्य मुद्रा और लगातार कार्य द्वारा प्रभावित होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिल्प संबंधी कार्यों में शारीरिक समस्याएँ व्यापक रूप से पाई जाती हैं। चौधरी, सिंह एवं सहयोगियों (2018) ने अपने प्रणालीगत समीक्षा अध्ययन में विभिन्न देशों के हस्तशिल्प श्रमिकों में कार्य-संबंधी मस्कुलोस्केलेटल विकारों की व्यापकता का विश्लेषण किया है। समीक्षा से यह निष्कर्ष सामने आया कि हस्तशिल्प श्रमिकों में गर्दन, कमर, घुटने और ऊपरी अंगों में दर्द सबसे सामान्य स्वास्थ्यगत समस्या है। लंबे कार्य घंटे, खराब कार्य मुद्रा, दोहरावयुक्त गतिविधियाँ और कार्य.स्थल का तनाव स्वास्थ्य समस्या के प्रमुख कारक हैं ।

 

शर्मा और मेहता (2021) ने मध्य प्रदेश के बाघ क्षेत्र के हैंड ब्लॉक प्रिंट शिल्पकारों पर किए गए एर्गोनॉमिक अध्ययन में हाथ, कलाई और उंगलियों में दर्द, सुन्नता और कमजोरी जैसी समस्याओं की जांच की है। अध्ययन में यह पाया गया कि लंबे समय तक लगातार ब्लॉक प्रिंटिंग कार्य करने से शिल्पकारों में क्रॉनिक मस्कुलोस्केलेटल विकार विकसित हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि कार्य में दोहराव और भारी शारीरिक दबाव शिल्पकारों की कार्य-क्षमता को प्रभावित करता है। कोफ्लर और वाल्डर (2024) ने शिल्प क्षेत्र के भविष्य और स्वास्थ्य पर तकनीकी विकास के प्रभावों का अध्ययन करते हुए यह बताया है कि पारंपरिक शिल्प कार्यों में शारीरिक श्रम की अधिकता शिल्पकारों में दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देती है। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि डिजिटलीकरण और तकनीकी सहायता को एर्गोनॉमिक दृष्टिकोण से अपनाया जाए, तो शिल्पकारों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार संभव है।

 

अविनाश, साहू और संगीता, पंडित (2025) ने भारत के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत ढोकरा (घड़वा) शिल्पकारों पर किए गए अपने अध्ययन में कार्यस्थल एर्गोनॉमिक्स और (मस्कुलोस्केलेटल) पीठ / गर्दन दर्द विकारों के आपसी संबंध का विश्लेषण किया है। यह अध्ययन छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के शिल्पकारों पर आधारित है, जिसमें यह पाया गया कि असुविधाजनक कार्यस्थल, झुककर कार्य करना और लंबे समय तक एक ही मुद्रा में काम करने से कमर, गर्दन और कंधों में दर्द की समस्या व्यापक है। शोध में एक सुधारित एर्गोनॉमिक कार्य-स्थल मॉडल विकसित कर लागू किया गया, जिससे शिल्पकारों के शारीरिक कष्टों में उल्लेखनीय कमी देखी गई। इमान डायनाट और मोहम्मद अली करीमी (2016) द्वारा ईरान के विभिन्न हस्तशिल्प श्रमिकों पर किए गए क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि अधिकांश शिल्पकारों को गर्दन दर्द, कमर दर्द और कंधों में दर्द की समस्या का अत्यधिक सामना करना पड़ता है । गर्दन दर्द, कमर दर्द, घुटने  और कंधों में दर्द का कारण ज्ञात करने पर स्पष्ट हुआ की लंबे समय तक बैठकर एक ही मुद्रा मे कार्य करने से तथा दोहरावयुक्त शारीरिक गतिविधियाँ शिल्पकारों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

 

भारतीय संदर्भ में साहू और पंडित (2025) द्वारा छत्तीसगढ़ के ढोकरा शिल्पकारों पर किए गए अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि असंगठित क्षेत्र में कार्यरत शिल्पकारों के लिए कार्यस्थल की एर्गोनॉमिक स्थिति अत्यंत कमजोर है। इस कारण कमर, गर्दन और कंधों में दीर्घकालिक दर्द की समस्या व्यापक रूप से देखी गई। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि यदि कार्यस्थल के डिज़ाइन और कार्य मुद्रा में सुधार किया जाए, तो शिल्पकारों की स्वास्थ्य समस्याओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इसी क्रम में किए गए एक प्रणालीगत समीक्षा अध्ययन (चौधरी एट. अल., 2018) से यह निष्कर्ष निकलता है कि विश्व स्तर पर हस्तशिल्प श्रमिकों में मस्कुलोस्केलेटल विकारों की व्यापकता 38.5 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक पाई गई है। इस समीक्षा के अनुसार गर्दन, पीठ, घुटने और ऊपरी अंगों से संबंधित दर्द सबसे सामान्य स्वास्थ्य समस्या है, जिसके पीछे लंबे कार्य घंटे, खराब कार्य मुद्रा, लगातार दोहराव वाला कार्य तथा कार्य-स्थल तनाव जैसे कारक उत्तरदायी हैं। अन्य अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि पारंपरिक शिल्प कार्यों में आधुनिक तकनीक और स्वास्थ्य-अनुकूल उपकरणों की कमी शिल्पकारों की कार्य-क्षमता को प्रभावित करती है तथा उन्हें दीर्घकालिक शारीरिक कष्टों की ओर ले जाती है। तकनीकी विकास और एर्गोनॉमिक हस्तक्षेप के अभाव में शिल्पकारों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य निरंतर जोखिम में बना रहता है। समग्र रूप से इन अध्ययनों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि शिल्पकारों की स्वास्थ्य समस्याएँ केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और कार्य-स्थितिगत हैं, यदि शिल्प क्षेत्र में स्वास्थ्य-अनुकूल कार्य-परिस्थितियाँ, एर्गोनॉमिक सुधार तथा नीतिगत हस्तक्षेप सुनिश्चित किए जाएँ, तो शिल्पकारों के जीवन-स्तर और कार्य.क्षमता में सुधार संभव है।

 

हस्तशिल्प क्षेत्र पर किए गए शोधों से हस्त शिल्पकारों की कई स्वास्थ्य समस्याओं का पता चलता है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में पट्टी बनाने का काम करने वाली महिलाएं खराब रोशनी, कम वेंटिलेशन और स्थिर बैठने जैसी स्थितियों में लंबे समय तक काम करती हैं। कार्यस्थल और अपने स्वास्थ्य के प्रति कम जागरूकता और लापरवाही के कारण, वे कई स्वास्थ्य समस्याओं से घिर गई हैं, जैसे सिरदर्द, धंसी हुई आंखें, पेट की समस्या, थकान, उंगलियों के सिरों में सुन्नपन, शरीर में सूजन और पीठ, आंखों, गर्दन, कंधों, हथेलियों, कलाई और घुटनों में दर्द (खान और सिंह, 2015)। नेपाल के भक्तपुर जिले में कालीन कारखानों में भी ऐसी ही स्थिति देखी गई है। अधिकांश महिला श्रमिक 8-12 घंटे काम करती हैं और इन कार्यस्थलों पर धूल नियंत्रण, वेंटिलेशन और अग्नि प्रबंधन जैसी सुविधाओं की कमी के कारण उनकी कार्य परिस्थितियां दयनीय हैं। श्रमिकों द्वारा पीठ दर्द/जोड़ों में दर्द, आँखों में जलन, लंबे समय तक सिरदर्द, सीने में दर्द और त्वचा में जलन जैसी समस्याओं की शिकायत आम तौर पर की गई थी। (सुबेदी और बनमाला, 2015)। लखनऊ के चिकनकारी श्रमिकों को हाथों में झुनझुनी और गठिया जैसी कई व्यावसायिक स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। (सिंह और शर्माए 2016)। गंगोपाध्याय, चक्रबर्ती, सरकार, देव और दास (2014) ने पश्चिम बंगाल के चिकन कढ़ाई श्रमिकों में सबसे आम स्वास्थ्य समस्या के रूप में कमर दर्द को पाया। कार्य विधियों में कठोरता, लंबे समय तक काम करना, कमाई को लेकर असंतोष, नीरस कार्य पैटर्न और स्थिर बैठने की मुद्रा को इन व्यावसायिक स्वास्थ्य समस्याओं के कुछ कारण माना गया।

 

शोध आलेख का उद्देश्य:

प्रस्तुत शोध आलेख का उद्देश्य हस्त शिल्पकारों में पाई जाने वाली प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं के स्वरूप की पहचान करना तथा उनके कारणों और सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करना है।

 

अध्ययन पद्धति:

यह अध्ययन गुणात्मक अनुसंधान पद्धति पर आधारित है । अध्ययन हेतु बस्तर संभाग के 4 जिलों कांकेर, बस्तर, नारायण एवं कोंडागांव क्षेत्र के कुल 938  शिल्प कारीगरों का चयन उद्देश्यपूर्ण निदर्शन से किया गया है, जिनमे बाँस कला के 188, पत्ता कला के 92, मिट्टीकला के 268, लौह्कला के 201, धातु कला के 99, कौडी कला के 64, तथा काष्ठकला के 26 शिल्पकारों को चयनित किया गया है । शिल्पकारों की स्वास्थ्यगत समस्या के स्वरूप, कारणो एवं प्रभावों को प्रलेखित करने के लिए एक संरचित साक्षात्कार मार्गदर्शिका उपकरण और सहभागी अवलोकन प्रविधि का उपयोग किया गया है । प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतो से प्राप्त तथ्यों के आधार पर अध्ययन विषय से संबंधित जानकारी को प्रस्तुत किया गया है ।

 

शिल्पकला निर्माण की प्रक्रिया का शिल्पकारों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:

कार्यस्थल के वातावरण के आधार पर शिल्पकारों को कई प्रकार के स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें मिट्टी का धूल, बांस का बुरादा, कार्य के दौरान उपयोग की जाने वाली आग की लौ (चिंगारी), हानिकारक रसायन, शोर और एर्गोनॉमिक्स संबंधी समस्याएं आदि शामिल हो सकती हैं। कार्यभार का तनाव, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का अनुचित उपयोग, तनाव, अस्वस्थ कार्य वातावरण और खराब कार्य परिस्थितियां आदि जैसे कुछ अन्य कारक भी स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। शिल्पकारों में अशिक्षा और सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता की कमी भी एक कारण हो सकती है। हस्त शिल्पकारों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि शिल्पकारों को विभिन्न व्यावसायिक खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। यह भी महत्वपूर्ण है कि शिल्पकार प्रबंधन शिल्पकारों को होने वाली संभावित स्वास्थ्यगत खतरनाक स्थितियों से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए (सिंहए 2016)। लिलीपेट, जैन और जोसेफ (2017) ने वस्त्र कारखाने के श्रमिकों में स्वास्थ्य समस्याओं का अध्ययन किया और पाया कि अधिकांश श्रमिक महिलाओं को जो सिलाई, कटाई और वितरण जैसे कार्यों में लगी थी को लंबे समय तक लगातार बैठने, कमर झुकाने और मोड़ने, काम के दौरान असामान्य मुद्रा और गतिविधियों, और लगातार खड़े रहने के कारण पीठ और कंधे के क्षेत्र में मांसपेशियों और हड्डियों से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है । चिंता, अवसाद और शारीरिक समस्याओं से जूझ रही हैं । जहान एट अल. (2015) ने पाया कि वस्त्र निर्माण में संलगन श्रमिकों, विशेष रूप से सिलाई मशीन ऑपरेटरों में मांसपेशियों और हड्डियों से संबंधित अधिक स्वास्थ्यगत समस्याएं देखी गई। इन श्रमिकों ने गर्दन, पीठ के निचले हिस्से, कंधे के जोड़, कोहनी, पीठ के ऊपरी हिस्से और कूल्हे के जोड़ जैसे शरीर के विभिन्न हिस्सों में दर्द होना बताया।

 

शिल्पकार कारीगरों के स्वास्थ्य पर परिवार के सदस्यों के व्यवहार का प्रभाव:

शिल्पकार के जीवन, कार्य-निरंतरता और मानसिक संतुलन में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। परिवार के सदस्यों का प्रोत्साहन से लेकर उपेक्षा तक जैसा व्यवहार कई स्तरों पर शिल्पकार को प्रभावित करता है। परिवार के सदस्यों का सहयोगात्मक एवं सकारात्मक व्यवहार के फलस्वरूप परिवार के सदस्य कच्चा माल जुटाने, निर्माण प्रक्रिया, रंगाई-पुताई, पैकिंग व विपणन में सहयोग करते हैं। बुज़ुर्ग पीढ़ी द्वारा तकनीक, प्रतीक और अनुष्ठानों का हस्तांतरण सफलतापूर्वक होता है। आर्थिक अनिश्चितता के बावजूद परिवार का उत्साहवर्धन शिल्पकार की रचनात्मकता को बढ़ाता है। परिवार को शिल्प पर गर्व होने से सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। वहीं इसके विपरीत नकारात्मक व्यवहार अनेक तरह की समस्याओं को जन्म देता है। सकारात्मक व्यवहार से जहां आत्मविश्वास, नवाचार, शिल्प की निरंतरता बनी रहती है तो नकारात्मक व्यवहार के फलस्वरूप शिल्पकला के पेशे से अलगाव, स्वयं से अलगाव, परिवार एवं समाज से अलगाव, तनाव, हीनभावना, पेशा-परिवर्तन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। यहाँ पर एमिल दुर्खिम एवं कार्लमार्क्स के अलगाव के सिद्धांत की पुष्टि होती है।

 

जीविकोपार्जन से जुडी किसी भी प्रकार के शारीरिक श्रम कार्य का स्वास्थ्य पर कुछ न कुछ प्रभाव जरुर होता है । यह व्यक्ति के द्वारा उत्पादन कार्य दौरान व्यतीत किये गए कार्य के घंटे एवं कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है जो व्यक्ति जितना ज्यादा किसी कार्य को बिना रुके जितनी रफ्तार से करेगा वह व्यक्ति उतनी तेजी से शारीरिक थकान को महसूस करेगा । प्रस्तुत तालिका में शिल्पकला का स्वास्थ्य पर प्रभाव को दर्शाया गया है -

 

तालिका क्रमांक 1: शिल्पकला का स्वास्थ्य पर प्रभाव

शिल्पकला

स्वास्थ्य पर प्रभाव

कुल

हाँ

नहीं

बाँस कला

165

23

188

87.77%

12.23%

100.00%

पत्ता कला

82

10

92

89.13%

10.86

100.00%

मिट्टी कला

245

23

268

91.41%

8.58%

100.00%

लौह कला

134

67

201

66.66%

33.33%

100.00%

धातु कला

95

4

99

95.95%

4.04%

100%

कौड़ी कला

59

5

64

92.18%

7.81%

100.00%

काष्ठ कला

23

3

26

88.46%

11.53%

100.00%

कुल

803

135

938

85.60%

14.39%

100.00%

 

तालिका क्रमांक 1: में प्रदर्शित शिल्पकला का स्वास्थ्य पर प्रभाव सम्बन्धी तथ्यों से स्पष्ट है कि विभिन्न विधों से जुड़े अधिकतर शिल्पकारों ने शिल्प कला के निर्माण के दौरान स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने की बात स्वीकार की है जबकि मात्र 14.39 प्रतिशत शिल्पकारों ने किसी प्रकार के प्रभाव से इऩकार किया है। शिल्पकला के स्वरूप के आधार पर देखें तो ज्ञात होता है कि अधिकतर (96 प्रतिशत) धातु कला के शिल्पकारों ने स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने की बात स्वीकार की है। इसी तरह बाँस कला के सर्वाधिक (87.77 प्रतिशत), पत्ता कला के (89.13 प्रतिशत), मिट्टी कला के (91.42 प्रतिशत), लौह कला के (66.67 प्रतिशत), कौड़ी कला के (92.19 प्रतिशत), एवं काष्ठ कला के (88.46 प्रतिशत) शिल्पकारों ने स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने की पुष्टि की है । शिल्पकारों का यह भी कहना है कि स्वास्थ्य गत समस्याओं के चलते इनका कार्य से अलगाव का दर बढ़ने लगा है, इसके अलावा पारिवारिक एवं सामाजिक मनमुटाव में भी वृद्धि होने लगी जिसके कारण कार्य से असंतोष होने लगा है, इस प्रकार के परिस्थियों के चलते इनके बच्चे शिल्पकला से जुड़ना नहीं चाहते । ऐसे शिल्पकार जो सुरक्षा मानदंडों का पालन करते हुए शिल्पकला का निर्माण करते है उन्हें स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ना हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है । निष्कर्षतः शिल्पकला के निर्माण के दौरान शिल्पकारों को स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

 

स्वास्थ्यगत समस्या के स्वरूप:

प्रस्तुत शोध आलेख में स्वास्थ्यगत समस्या को दो प्रकारों में विभक्त किया गया है - प्रथम - शारीरिक एवं दूसरा मानसिक स्वास्थ्य । यहाँ शारीरिक स्वास्थ्य से तात्पर्य शारीरिक फुर्तीलेपन से है एवं मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य तनाव रहित मस्तिष्क से है । मानसिक स्वास्थ्य, स्वास्थ्य और खुशहाली का एक अभिन्न अंग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (2022) इसे ‘नसिक खुशहाली की एक ऐसी स्थिति’ के रूप में परिभाषित करता है जो लोगों को जीवन के तनावों से निपटने, अपनी क्षमताओं को पहचानने, अच्छी तरह सीखने और काम करने और अपने समुदाय में योगदान देने में सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर तनाव, चिंता और अवसाद के स्तर से मापा जाता हैए चिंताए अवसाद या तनाव ए पारिवारिक और सामाजिक जीवनए आर्थिक गतिविधि और अन्य व्यावसायिक भूमिकाओं जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कामकाज में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं (ब्रेनेस, 2007)। जब मनुष्य तनावरहित होकर संपूर्ण फुर्ती के साथ काम करता है तो उसकी कार्य मे रुचि बनी होती है परिणामस्वरूप उत्पादन कार्य मे वृद्धि होती है लेकिन जब व्यक्ति तनाव और थकान मे कार्य करता है तो उसके कार्य के प्रति नीरसता बनी रहती है जो उत्पादन को प्रभावित करता है। यहाँ पर हेराल्ड अब्राहम माँस्लोव का कार्य अभिप्रेरणा का मानवीय आवश्यकता संबंधी सिद्धांत एवं फ्रेडरिक हजबर्ग का अभिप्रेरणा का स्वक्छ्ता का सिद्धांत लागू होता है । कार्यस्थल पर सहकर्मियों का व्यवहार सहयोगात्मक एवं कार्य की दशाएँ अच्छी होने पर उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता हैं, सहयोगात्मक वातावरण एवं कार्यस्थल पर उपलब्ध सुविधाएँ व्यक्ति को कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती हैं लेकिन यदि इसके विपरीत परिस्थिति हो तो शिल्पकार का उत्पादकता एवं सहकर्मियों से अलगाव होने लगता है ।

 

तालिका क्रमांक 1.1: स्वास्थ्य पर प्रभाव का स्वरूप

शिल्पकला

स्वास्थ्य पर प्रभाव का स्वरूप (N=803)

कुल

आँख खराब होना

खाँसीध्दमा

शरीर में दर्द

थकान और मानसिक तनाव

बाँस कला

16

0

149

0

165

10.00%

0.00%

90.00%

0.00%

100%

पत्ता कला

0

0

79

3

82

0.00%

0.00%

96.00%

4.00%

100%

मिट्टी कला

21

9

203

12

245

8.00%

4.00%

83.00%

5.00%

100%

लौह कला

22

11

89

12

134

16.40%

8.20%

66.40%

9.00%

100%

धातु कला

30

7

56

2

95

31.58%

7.37%

58.95%

2.10%

100%

कौड़ी कला

7

0

49

3

59

12.00%

0.00%

83.00%

5.00%

100%

काष्ठ कला

3

2

17

1

23

13.00%

9.00%

74.00%

4.00%

100%

कुल

99

29

642

33

803

12.00%

4.00%

80.00%

4.00%

100%

 

शिल्पकारों के स्वास्थ्य पर प्रभाव के स्वरूप से यह ज्ञात होता है कि अधिकतर शिल्पकारों ने शऱीर में दर्द, कुछ शिल्पकारों ने श्वसन संबंधी रोग, कुछ शिल्पकारों ने खांसी और दमा तथा कुछ शिल्पकारों ने थकान और मानसिक तनाव की समस्या होना बतलाया है। शिल्पकला की विधाओं के आधार स्वास्थ्य समस्या के कारणों से संबंधित शिल्पकारों से चर्चा करने पर इस तथ्य की पुष्टि हुई कि लंबे समय तक एक ही स्थिति में कार्य करने से अधिकतर शिल्पकार शरीर में दर्द की समस्या से पीड़ित हैं।

 

स्वास्थ्य पर प्रभाव के कारणों की समीक्षा करने पर यह तथ्य सामने आया कि लगातार एक मुद्रा में घंटो बैठकर या झुककर काम करने के कारण पैरों में सुन्नपन एवं झुंझुनीए पीठ एवं कमर मे दर्द, एक टकटकी में काम करने के कारण सिर एवं आँखों में दर्द, शिल्पकला के निर्माण के दौरान निकलने वाले सूक्ष्म धूल एवं बुरादों के कण के कारण दमा एवं सांस् लेने की दिक्कतों से इन्हे जुझना पड़ता है ।

 

इन शिल्पकारों से जब यह जानने का प्रयास किया गया कि वे अपने स्वास्थ्य से सम्बंधित रोगों का इलाज कराते है कि नहीं में शत प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा की वे अपनी स्वास्थ्य समस्या का स्वास्थ्य केंद्र पर उपचार नहीं करा पातें है, बल्कि ये अपने स्तर पर बैगा गुनिया के द्वारा अपने स्वास्थ्य का उपचार कराते हैं। तालिका क्रमांक 1.2 के माध्यम से शिल्पकारों द्वारा स्वास्थ्य का उपचार न करा पाने के कारणों को समझने का प्रयास किया गया है -

 

तालिका क्रमांक 1.2: स्वास्थ्य का उपचार नहीं कराने के कारण

शिल्पकला

स्वास्थ्य का उपचार नहीं कराने के कारण  (N = 803)

कुल

चिकित्सालय की कमी

आर्थिक तंगी

कार्य की अधिकता

जागरूकता का अभाव

बाँस कला

32

53

22

58

165

19.39

32.12

13.33

35.15

100%

पत्ता कला

8

33

16

25

82

9.75

40.24

19.51

30.48

100%

मिट्टी कला

21

117

70

37

245

8.57

47.75

28.57

15.1

100%

लौह कला

11

32

79

12

134

8.2

23.88

58.95

8.95

100%

धातु कला

10

53

13

19

95

10.52

55.78

13.68

20

100%

कौड़ी कला

7

38

5

9

59

11.86

64.4

8.47

15.25

100%

काष्ठ कला

2

9

5

7

23

8.69

39.13

21.73

30.43

100%

कुल

91

335

210

167

803

11.33

47.71

26.15

20.79

100%

 

प्रस्तुत आंकड़ों से स्पष्ट है कि अध्ययनगत समूह के अधिकांश हस्त शिल्पकारों कि आर्थिक स्थिति दयनीय हैं, आर्थिक तंगी के चलते ये अपना उपचार नहीं करना चाहते, एक - चौथाई के लगभग शिल्पकार अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक नहीं है, इसी प्रकार दूरस्थ क्षेत्रों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं के आभाव के कारण ये अपना उपचार नहीं करा पातें हैं । वे अक्सर प्राइवेट या महंगे अस्पतालों की बजाय सरकारी अस्पतालों या मुफ्त चिकित्सा सेवा पर निर्भर रहते हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव का कारण ये अपना उपचार रोग के प्रकृति के आधार पर संबंधित चिकित्सक से नहीं करा पातेए इसके अलावा इनके अंदर का झिझक इन्हे चिकित्सक के पास जाने से रोकता है । जिसमे इन्होने गरीबी एवं चिकित्सा सुविधा का आभाव तथा कार्य की अधिकता को जिम्मेदार मानते हैं ।

 

शिल्पकारों की मानसिक स्थिति:

सामान्य रूप से किसी भी व्यवसाय को लेकर शिल्पकारों  में अनेक तरह की चिंता देखने को मिलती है। अध्ययन के दौरान यह ज्ञात करने का भी प्रयास किया गया कि शिल्पकला के क्षेत्र में शिल्पकारों को अपने व्यवसाय को लेकर चिंता महसूस होती है अथवा नहीं। पूर्व के अनेक अध्ययनों में यह तथ्य प्रकाशित होता रहा है कि शिल्पकारों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनके समक्ष अनेक समस्याएँ भी रहती हैं। देसाई, रीता और पाटिल, संजय (2019) ने भारत के असंगठित शिल्प क्षेत्र में 300 हस्तशिल्प कारीगरों पर केस स्टडी की । अध्ययन में पाया गया कि सामाजिक असुरक्षा, युवा शिल्पकारों में पहचान संकट और पारंपरिक कौशल के प्रति घटती रुचि मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। सर्वेक्षण के अनुसार 47% कारीगरों में हताशा और 38% में आत्म-संदेह के लक्षण देखे गए। सिंहए अनुराधा एवं चौधरीए विवेक (2020) ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 180 हस्तशिल्प श्रमिकों पर मिश्रित पद्धति (Mixed Method) से अध्ययन किया। अध्ययन में आर्थिक, सामाजिक और कार्य-परिस्थितियों के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया। शोध ने दिखाया कि अनियमित आय और पारंपरिक कार्य से जुड़े सामाजिक दबावों के कारण 58% शिल्पकारों में चिंता और 33% में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए। इस तथ्य की पुष्टि निम्न तालिका के माध्यम से की गई है -

 

तालिका क्रमांक 2: शिल्पकला व्यवसाय को लेकर चिंता महसूस करना

शिल्पकला

चिंता महसूस करना

कुल

हाँ

नहीं

बाँस कला

112

76

188

59.57%

40.43%

100.00%

पत्ता कला

42

50

92

45.65%

54.35%

100.00%

मिट्टी कला

201

67

268

75.00%

25.00%

100.00%

लौह कला

125

76

201

62%

38%

100.00%

धातु कला

69

30

99

0.70%

0.30%

100.00%

कौड़ी कला

22

42

64

34.38%

65.63%

100.00%

काष्ठ कला

23

3

26

88.46%

11.54%

100.00%

कुल

594

344

938

63.33%

36.67%

100.00%

                                   

शिल्पकला व्यवसाय को लेकर चिंता महसूस किये जाने के सम्बन्ध में अध्ययनगत समूह के आधे से अधिक शिल्पकार अपने व्यवसाय को लेकर चिंतित रहते हैं, यदि शिल्पकला की विविध विधाओँ के अंतर्गत अंतर्गत चिंता का स्वरूप देखने से ज्ञात हुआ की बाँस कला के 59.57 प्रतिशत, मिट्टी कला के 75 प्रतिशत, लौह कला के 62 प्रतिशत, धातु कला के 70 प्रतिशत व काष्ठ कला के 88.46 प्रतिशत शिल्पकारों ने अपने व्यवसाय को लेकर चिंता व्यक्त की है जबकि कौड़ी कला व पत्ता कला के लगभग आधे से अधिक शिल्पकारों ने किसी प्रकार की चिंता से इनकार किया है।

 

चिंता का स्वरूप:

अध्ययन के दौरान मुख्य रूप से कम आय और अस्थिर बाजारए पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यवसाय के हस्तांतरण की बाधाएँ और कच्चे माल की अनुपलब्धता जैसी चिंताएँ देखने को मिली जिसकी प्रस्तुति निम्न तालिका के माध्यम से की गई है-

 

तालिका क्रमांक 2.1: चिंता का स्वरूप

शिल्पकला

चिंता का स्वरूप (N=594)

कुल

कम आय, बाजार प्रतिस्पर्धा, बिचौलियों पर निर्भरता और कच्चे माल की अनुपलब्धता

नई पीढ़ी का दूरी बनाना और परंपरागत ज्ञान का लुप्त होना

तकनीकी और कौशल से जुड़ी चिंता

बाँस कला

56

34

22

112

50.00%

30.36%

19.64%

100.00%

पत्ता कला

0

0

42

42

0%

0%

100.00%

100.00%

मिट्टी कला

89

64

48

201

44.27%

31.84%

23.89%

100.00%

लौह कला

58

39

28

125

46.04%

31.02%

22.04%

100.00%

धातु कला

38

14

17

69

55.00%

20.00%

25.00%

100.00%

कौड़ी कला

2

9

11

22

9.00%

41.00%

50.00%

100.00%

काष्ठ कला

4

14

5

23

17.00%

61.00%

22.00%

100.00%

कुल

247

174

173

594

41.59%

29.29%

29.12%

100.00%

 

शिल्पकारों की चिंता के स्वरूप से यह ज्ञात होता है कि लगभग एक तिहाई से अधिक शिल्पकार शिल्पकला के विक्रय से प्राप्त कम आय, बाजार की प्रतिस्पर्धा और कच्चे माल की अनुपलब्धता से चिंतित रहते हैं। लगभग एक चौथाई शिल्पकारों ने नई पीढ़ी के दूरी बनाने के फलस्वरूप परंपरागत ज्ञान के विलुप्त होने तथा इतने ही शिल्पकारों ने तकनीकी और कौशल से जुड़ी चिंता व्यक्त की है। वस्तुतः शिल्पकारों के समक्ष आर्थिक चिंताएँ सबसे ज्यादा देखने को मिली हैं जिसमें मुख्य रूप से कम आय और अस्थिर बाजार, बिचौलियों पर निर्भरता तथा कच्चे माल की अनुपलब्धता की चिंता शामिल है। कम आय और अस्थिर बाजार की वजह से कारीगरों को मेहनत के अनुपात में उचित दाम नहीं मिल पाता। बिचौलियों पर निर्भरता की वजह से असली मुनाफा प्रायः कारीगरों तक नहीं पहुँच पाता। इसके साथ ही कच्चे माल की अनुपलब्धता के साथ कच्चे माल की बढ़ती लागत की समस्याओं से भी शिल्पकार परेशान रहते हैं। दूसरी तरफ बाजार और प्रतिस्पर्धा शिल्पकला में भी हावी है। सस्ते और तेजी से बनने वाले मशीनी उत्पाद बाजार पर हावी हैं तथा ब्रांडिंग पैकेजिंग व आनलाइन बिक्री की कमी भी चिंता का कारण है। सामाजिक और पीढ़ीगत समस्याओं की वजह से भी शिल्पकार चिंतित रहते हैं। नई पीढ़ी शिल्पकला से दूरी बनाती आ रही है क्योंकि उसे इस क्षेत्र में कैरियर की संभावनाओँ का अभाव दिखता है। फलस्वरूप परंपरागत ज्ञान भी लुप्त होता जा रहा है। शिल्पकारों के समक्ष डिजिटल ज्ञान की कमी भी एक समस्या है जिसकी वजह से ई.कॉमर्स, सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान से दूरी देखने को मिली है। इसके अलावा नवाचार का अभाव भी देखने को मिला है। 

 

शिल्पकारों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को देखते हुये उनसे यह जानने का प्रयास किया गया की क्या उनके द्वारा भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए स्वास्थ्य बीमा कराया गया है या सरकार ने कराया है, इस संदर्भ मे सभी शिल्पकारों ने किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा कराने से इनकार किया है और न ही किसी प्रकार की शिल्पकार स्वास्थ्य बीमा योजना के बारे मे जानकारी दी ।

 

स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव - स्वास्थ्य के प्रभाव से तात्पर्य सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के प्रभाव से हैं। शिल्पकारों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का उनके सामाजिक, आर्थिक, मानसिक एवं सांस्कृतिक स्थिति पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार का प्रभाव देखा जा सकता है जो अध्ययन क्षेत्र के वातावरण, कार्य की दशाओं, सहयोगियों एवं नियोक्ता के व्यवहार, कार्यस्थल पर उपलब्ध सुविधाओं, कार्य के एवज मे मिलने वाले आर्थिक लाभ एवं सम्मान पर निर्भर करता है ।

 

गुप्ता, दीपक और वर्मा, नितिन (2021) ने छत्तीसगढ़ के धातु और काष्ठ शिल्पकारों पर गुणात्मक अध्ययन किया। गहन साक्षात्कार के आधार पर यह पाया गया कि युवा शिल्पकार पारंपरिक काम से पलायन करते हैं और आर्थिक दबाव के कारण मानसिक तनाव व असुरक्षा महसूस करते हैं। वरिष्ठ कारीगरों में कार्य-परंपरा के प्रति गर्व के बावजूद सामाजिक मान्यता की कमी मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही थी।

 

तालिका क्रमांक 3: स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव

शिल्पकला

शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव

कुल

हाँ

नहीं

बाँस कला

145

43

188

77.12%

22.87%

100.00%

पत्ता कला

82

10

92

89.13%

10.86%

100.00%

मिट्टी कला

147

121

268

54.85%

45.14%

100.00%

लौह कला

127

74

201

63.18%

36.81%

100.00%

धातु कला

95

4

99

95.95%

4.04%

100%

कौड़ी कला

57

7

64

89.06%

10.93%

100.00%

काष्ठ कला

19

7

26

73.07%

26.92%

100.00%

कुल

672

266

938

85.60%

14.39%

100.00%

तालिका क्रमांक 3 से स्पष्ट है कि अधिकाश शिल्पकारों ने स्वास्थ्य का उनपर  एवं शिल्पकला पर प्रभाव पढ़ने कि बात स्वीकार कि है जबकि कुछ शिल्पकारों ने इस बात से इनकार किया है ।

 

स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव का स्वरूप:

शिल्पकला के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा एवं महँगाई, शिल्पकला के अन्य विकल्प के कारण शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष  प्रभाव देखा जा सकता है । गुप्ता, दीपक और वर्मा, नितिन (2021) ने छत्तीसगढ़ के धातु और काष्ठ शिल्पकारों पर गुणात्मक अध्ययन किया। गहन साक्षात्कार के आधार पर यह पाया गया कि युवा शिल्पकार पारंपरिक काम से पलायन करते हैं और आर्थिक दबाव के कारण मानसिक तनाव व असुरक्षा महसूस करते हैं। वरिष्ठ कारीगरों में कार्य.परंपरा के प्रति गर्व के बावजूद सामाजिक मान्यता की कमी मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही थी। दीपक गुप्ता और नितिन वर्मा के अध्ययन के अनुसार युवा शिल्पकार जहां आर्थिक दबाव की वजह से मानसिक तनाव व असुरक्षा महसूस करते हैं तो वरिष्ठ कारीगर सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी की वजह से कार्य से विरक्त हो रहे हैं। स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है इसे देखने का प्रयास किया गया है -

 

तालिका क्रमांक 3.1:  स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव का स्वरूप

शिल्पकला

शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव का स्वरूप

कुल

कार्य से अलगाव

दूसरे व्यवसाय की तरफ रुझान मे वृद्धि

बाँस कला

102

43

145

70.34

29.65%

100.00%

पत्ता कला

72

10

82

87.8

12.19

100.00%

मिट्टी कला

26

121

147

17.68

82.31%

100.00%

लौह कला

53

74

127

41.73

58.26%

100.00%

धातु कला

91

4

95

95.78

4.21%

100.00%

कौड़ी कला

50

7

57

87.71

12.28%

100.00%

काष्ठ कला

12

7

19

63.15

36.84%

100.00%

कुल

406

266

672

60.41%

39.58%

100.00%

तालिका क्रमांक 3.1 स्वास्थ्य का शिल्पकला एवं शिल्पकारों पर प्रभाव का विश्लेषण करने पर ज्ञात हुआ कि अधिकाश धातु कला एवं कौड़ी काला के शिल्पकारों ने बतलाया कि उनका अब उनके कार्य से अलगाव होने लगा है वही कई शिल्पकार का दूसरे व्यवसाय की तरफ रुझान हो रहा है इसका कारण वे कच्चे माल का अभाव ए ग्राहकों से प्रत्यक्ष संवाद का अभाव एबिचौलियों पर निर्भरता के कारण होने वाला मानसिक तनावए कार्य के दौरान होने वाली स्वास्थ्यगत समस्या को जिम्मेदार मानते हैं । यही कारण है कि धातु कला ए कौड़ी कला एवं पत्ता कला का अस्तित्व ख़तरे मे है ।

 

निष्कर्ष:-

शिल्पकार समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैंए लेकिन उनकी स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक है। शिल्पकारों की स्वास्थ्य समस्याएँ केवल व्यक्तिगत या चिकित्सकीय मुद्दा नहीं हैंए बल्कि यह सामाजिकए आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं से संबंधित हैं।  सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के कारण उन्हें विभिन्न प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। कम आयए असुरक्षित कार्य वातावरण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण इनकी समस्याएँ और अधिक गंभीर हो जाती हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि काम की अस्थिरताए वित्तीय अनिश्चितताए और शिल्पकारों के अधिकारों की अनदेखी उन्हें मानसिक दबाव में डाल सकती है।यदि सरकार और समाज मिलकर इनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँए सुरक्षित कार्यस्थल और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराएँए तो उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार संभव है।

 

सुझाव:

1.  शिल्पकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ लागू की जानी चाहिए।

2.  कार्यस्थलों पर सुरक्षा उपकरण और उचित वेंटिलेशन की व्यवस्था होनी चाहिए।

3.  सरकार द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

4.  शिल्पकारों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सरकारी योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए।

 

नोट:

आभार - आईसीएसएसआर नई दिल्ली को उनके वित्तीय सहायता एवं पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर को परियोजना कार्य हेतु सहायता करने के लिए आभार व्यक्त करती हूँ। 

 

संदर्भ:

1.    कोठियाल, एल., मोहन, आदि शिल्प का गढ़ बस्तर, कुरुक्षेत्र, नई दिल्ली, वषर्-55. अंक-9, जुलाई 2009, पृष्ठ-21-22.

2.    खुराना, ललित, संपादकीय, कुरुक्षेत्र, ग्रामीण शिल्प, वर्ष-69, मासिक अंक-07, मई-2023, पृष्ठ-4.

3.    लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-236-237.

4.    लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-240.

5.    लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-241.

6.    लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-247-248.

7.    व्हीलर, मोर्टिमर, सिंधु सभ्यता, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज, 1968, गांधी, हेमा, हस्तशिल्प कला से रोजगार, कुरुक्षेत्र, ग्रामीण हस्तशिल्प, नई दिल्ली, वर्ष-55. अंक-9, जुलाई 2009, पृष्ठ-3.

8.    मिश्रा, आद्या, प्राचीन भारतीय वदमय में शिल्प और कला, वैदिक, पुराणिक, बौद्ध और जैन ग्रंथों आदि के संदर्भ में, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एप्लाइड रिसर्च 2022; 8(12): 295-298.

9.    भारतीय ज्ञान परंपरा में सर्वत्र पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों के संरक्षण की है बातए विश्व संवाद केंद्र भोपाल,

10.  कैथवास, वैभव, वेदों में निहित कलाओं का सौंदर्य, श्री विनायक पब्लिकेशऩ, आगरा, 2025, पृष्ठ-145.

11.  पाण्डेय, धनपति, अन्नत, अशोक, प्राचीन भारत का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहासए मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1998, पृष्ठ-17.

12.  खातून, मुस्तकीमा, भारतीय हस्तशिल्प का इतिहास और विरासत तथा पश्चिम बंगाल के चयनित हस्तशिल्पों के विशेष संदर्भ में इसका बाजार, जर्नल ऑफ कल्चरल रिसर्च स्टडीज, खंड-III अंक-1 (2024), पृष्ठ 61-72। (ISSN 2583-6137)। खुराना, ललिता, संपादकीय, कुरुक्षेत्र, ग्रामीण हस्तशिल्प, नई दिल्ली, वर्ष-55. अंक-9, जुलाई 2009, पृष्ठ-2.

13.  कोठियाल, एल., मोहन, आदि शिल्प का गढ़ बस्तर, कुरुक्षेत्र, नई दिल्ली, वषर्-55. अंक-9, जुलाई 2009, पृष्ठ-21-22.

14.  लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-239.

15.  लाला जगदलपुरी, बस्तर इतिहास एवं संस्कृति, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, चतुर्थ संस्करण-2016, पृष्ठ-239.

16.  बस्तर.गवर्मेंट.इन

17.  बैनर्जी, शिप्रा, ठाकुर, ऋचा, छत्तीसग़ढ़ के जिले गरियाबंद में कमार जनजाति द्वारा बांस कला से कलाकृति निर्माण का अध्ययनए रिसर्च रिव्यू इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी, पीयर रिव्यू जर्नल, वॉल्यूम-04, जुलाई-2019,

18.  खापर्डे, सुदा, पटेल, चेतन राम, कांकेर में रियासतकालीन जनजातीय समाज की परम्परागत लोक शिल्प कला का एतिहासिक महत्व, माइंड एंड सोसाइटी, वॉल्यूम 09, नंबर III और IV, सितंबर और दिसंबर 2020, पृष्ठ संख्या 53 से 56.

19.  गोयल, पीयुष, शिल्पकलाः आजीविका के साथ शिल्पकला का महत्वपूर्ण घटक, कुरुक्षेत्र, नई दिल्ली, मई 2023, पृष्ठ-38.

20.  खान, मुश्ताक, बस्तर के जीवन में बाँस, सहपीड़ीए.ऑर्ग/बांसबाबू-लाइफ-इन-थे-लाइफ-ऑफ़-बस्तर.

21.  गुप्ता, अरुणेश कुमार, छत्तीसगढ़ में बाँस उत्पादन की स्थिति एवं संभावनाएँ, अमोघवार्ता, वर्ष-03, वाल्यूम-03, इश्यू-2, 2023, पृष्ठ-207-208.

 

 

Received on 13.01.2026      Revised on 19.02.2026

Accepted on 08.03.2026      Published on 20.03.2026

Available online from March 23, 2026

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):23-32.

DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00005

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